Monday, July 12, 2021

श्री शिव अभिलाषाष्टक स्तोत्र


एकं ब्रह्मैवाद्वितीयं समस्तं
सत्यं सत्यं नेह नानास्ति किञ्चित्।

एको रुद्रो न द्वितीयोsवतस्थे
तस्मादेकं त्वां प्रपद्ये महेशम् ॥१॥

एकः कर्ता त्वं हि सर्वस्य शम्भो
नाना रूपेष्वेकरूपोsस्यरूपः  ।
यद्वत्प्रत्यस्वर्क  एकोsप्यनेकस्
तस्मान्नान्यं त्वां विनेशं प्रपद्ये ॥२॥

रज्जौ सर्पः शुक्तिकायां च रूप्यं
नीरः पूरस्तन्मृगाख्ये मरीचौ ।
यद्वत्तद्वत् विश्वगेष प्रपञ्चौ,
यस्मिन् ज्ञाते तं प्रपद्ये महेशम् ॥३॥

तोये शैत्यं दाहकत्वं च वह्नौ
तापो भानौ शीत भानौ प्रसादः ।
पुष्पे गन्धो  दुग्धमध्ये च सर्पिः
यत्तच्छम्भो त्वं ततस्त्वां  प्रपद्ये ॥४॥

शब्दं गृहणास्यश्रवास्त्वं हि जिघ्रेः
घ्राणस्त्वं व्यंघ्रिः आयासि दूरात् ।
व्यक्षः पश्येस्त्वं रसज्ञोऽप्यजिह्वः
कस्त्वां सम्यग् वेत्त्यतस्त्वां  प्रपद्ये ॥५॥

नो वेदस्त्वां ईश साक्षाद्धि  वेद
नो वा विष्णुर्नो विधाताखिलस्य ।
नो योगीन्द्रा नेन्द्र मुख्याश्च देवा
भक्तो वेद त्वामतस्त्वां प्रपद्ये ॥६॥

नो ते गोत्रं नेश जन्मापि नाख्या
नो वा रूपं नैव शीलं न तेजः ।
इत्थं भूतोsपीश्वरस्त्वं  त्रिलोक्याः
सर्वान् कामान् पूरयेस्तद् भजे त्वाम्॥७॥

त्वत्तः सर्वं त्वं हि सर्वं स्मरारे
त्वं गौरीशस्त्वं  च नग्नोsतिशान्तः ।
त्वं वै वृद्धः त्वं युवा त्वं च बालः
तत्किं यत्त्वं नास्यतस्त्वां नतोsस्मि ॥८॥

पूरे एक वर्ष तक यदि १०८ बार पाठ सम्भव न हो सके तो ८ या २८ बार प्रतिदिन पाठ कर मनुष्य अपनी अभिलाषा भगवान् शिव की कृपा से पूर्ण कर सकता है॥



:-श्री शिव अभिलाषाष्टक स्तोत्र की उत्पत्ति :-

प्राचीन काल में नर्मदा नदी के तट पर स्थित नर्मपुर नामक नगर में एक शिवभक्त रहते थे,उनका नाम था “विश्वानर मुनि”,उनकी पत्नी का नाम था “शुचिष्मति” ,एक दिन मुनि की पत्नी ने अपने पति से भगवान शिव के समान पुत्र की याचना की। मुनि ने पत्नी की श्रेष्ठ भावना को जानकर भगवान शिव की आराधना हेतु काशी को प्रस्थान किया।मुनि काशी पहुँच कर लिंगस्वरूप भगवन शिव की त्रिकाल कठिन पूजा करने लगे।

एक वर्ष की कठिन साधना के बाद उनको शिवलिंग के मध्य शिव स्वरुप आठ वर्ष का बालक दिखायी पड़ा,उस अष्टवर्षीय बालक की उन्होंने “अभिलाषाष्टक स्तोत्र” के द्वारा स्तुति की,स्तुति से प्रसन्न होकर भगवन शिव ने मुनि से वर मांगने को कहा,मुनि ने कहा आप सब जानते हैं,आप इच्छानुसार वर प्रदान करें। भगवान शिव ने मुनि से कहा तुम दोनों की अभिलाषा है कि मैं पुत्र रूप में प्राप्त होउ,तो मैं तुम्हारे यहाँ पुत्र रूप में प्रकट होऊँगा। 

वरदान के फलस्वरूप भगवान शिव शुचिष्मति के गर्भ से पुत्र रूप में प्रकट हुये। मुनि के बालक का नाम ब्रह्मा जी ने गृहपति रखा। नारद जी ने बालक के विषय में बताया कि,बारह वर्ष की अवस्था में इसे बिजली और अग्नि से भय की संभावना है। गृहपति अपने पिता जी से कहे,मैं काशी जाकर मृत्युञ्जय की आराधना करके महाकाल को भी जीत लूँगा,और काशी जाकर शिवलिंग की स्थापना कर काल को जीत लिया। 

           मुनि विश्वानर ने एक वर्ष तक फलाहार,जलाहार एवं वायु का सेवन कर “शिव अभिलाषाष्टक स्तोत्र”के द्वारा पुत्र रत्न की प्राप्ति की। अतः संतान के इच्छुक व्यक्ति एक वर्ष तक नित्य 108 बार आठ श्लोक का पाठ करके शिव सदृश पुत्र की प्राप्ति कर सकते हैं।  

            पुत्र की प्राप्ति पितरों के ऋण से मुक्त करती है,अतएव प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि पितृ ऋण से मुक्त होने के लिए एक धार्मिक पुत्र की प्राप्ति करें,जो इस अभिलाषाष्टक स्तोत्र के द्वारा पूर्ण हो सकती है,अर्थात पितृ-दोष से मुक्ति प्रदान करने में भी श्री शिव अभिलाषाष्टक स्तोत्र महत्वपूर्ण है।  

Tuesday, March 30, 2021

लिङ्गाष्टकम् | Lingashtakam | लिङ्गाष्टकम् स्तोत्रम्

 लिङ्गाष्टकम्  



ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गं निर्मलभासितशोभितलिङ्गम् । 

जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥१॥


देवमुनिप्रवरार्चितलिङ्गं कामदहं करुणाकरलिङ्गम् । 

रावणदर्पविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥२॥


सर्वसुगन्धिसुलेपितलिङ्गं बुद्धिविवर्धनकारणलिङ्गम् ।

सिद्धसुरासुरवन्दितलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥३॥


कनकमहामणिभूषितलिङ्गं फणिपतिवेष्टितशोभितलिङ्गम् । 

दक्षसुयज्ञविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥४॥


कुङ्कुमचन्दनलेपितलिङ्गं पङ्कजहारसुशोभितलिङ्गम् । 

सञ्चितपापविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥५॥


देवगणार्चितसेवितलिङ्गं भावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गम् ।

दिनकरकोटिप्रभाकरलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥६॥


अष्टदलोपरिवेष्टितलिङ्गं सर्वसमुद्भवकारणलिङ्गम् । 

अष्टदरिद्रविनाशितलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥७॥


सुरगुरुसुरवरपूजितलिङ्गं सुरवनपुष्पसदार्चितलिङ्गम् । 

परात्परं परमात्मकलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥८॥


लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ। 

शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥

शिव बिल्वाष्टकम् | बिल्वाष्टक स्तोत्रम् | बिल्वाष्टकम् | BILVASHTAKAM STOTRAM

 

शिव बिल्वाष्टकम् का पाठ,देगा मनचाहा लाभ



बिल्वाष्टकम् 



त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रयायुधम् । 
त्रिजन्मपाप-संहारमेकबिल्वं शिवार्पणम्।।1।।

त्रिशाखैर्बिल्वपत्रैश्च ह्यच्छिद्रै: कोमलै: शुभै: । 
शिवपूजां करिष्यामि ह्येकबिल्वं शिवार्पणम्।।2।।

अखण्डबिल्वपत्रेण पूजिते नन्दिकेश्वरे । 
शुद्धयन्ति सर्वपापेभ्यो ह्येकबिल्वं शिवार्पणम्।।3।।

शालिग्रामशिलामेकां विप्राणां जातु अर्पयेत्। 
सोमयज्ञ-महापुण्यमेकबिल्वं शिवार्पणम्।।4।।

दन्तिकोटिसहस्त्राणि वाजपेयशतानि च । 
कोटिकन्या-महादानमेकबिल्वं शिवार्पणम्।।5।।

लक्ष्म्या: स्तनत उत्पन्नं महादेवस्य च प्रियम्। 
बिल्ववृक्षं प्रयच्छामि ह्येकबिल्वं शिवार्पणम्।।6।।

दर्शनं बिल्ववृक्षस्य स्पर्शनं पापनाशनम्। 
अघोरपापसंहारमेकबिल्वं शिवार्पणम्।।7।।

काशीक्षेत्र निवासं च कालभैरव दर्शनम्। 
प्रयागमाधवं दृष्ट्वा एक बिल्वं शिवार्पणम् ।।8।।

मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे । 
अग्रत: शिवरूपाय ह्येकबिल्वं शिवार्पणम्।।9।।

बिल्वाष्टकमिदं पुण्यं य: पठेच्छिवसन्निधौ। 
सर्वपापविनिर्मुक्त: शिवलोकमवाप्नुयात्।।10।।

|| ॐ नमः शिवाय ||

Monday, October 5, 2020

शिव पंचाक्षर स्तोत्र

 


शिव पंचाक्षर स्तोत्र की रचना आदि शंकराचार्य ने की थी। नमः शिवाय के पहले पांचों अक्षरों न, म, शि, वा और य से पांच श्लोकों की रचना की गई है। इसके जरिए शंकराचार्य ने शिव की महिमा का बखान किया है, जो शिवस्वरूप है। जानते हैं इसके बारे में...

श्लोक- नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वराय। नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मै न काराय नमः शिवायः॥

अर्थ- जिनके कंठ मे सांपों का हार है, जिनके तीन नेत्र हैं, भस्म ही जिनका अनुलेपन हुआ है और दिशांए ही जिनके वस्त्र हैं, उन अविनाशी महेश्वर 'न' कार स्वरूप शिव को नमस्कार है।

श्लोक- मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय। मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मै म काराय नमः शिवायः॥

अर्थ- गंगाजल और चन्दन से जिनकी अर्चना हुई है, मन्दार के फूल और अन्य पुष्पों से जिनकी सुंदर पूजा हुई है, उन नन्दी के अधिपति और प्रमथगणों के स्वामी महेश्वर 'म' कार स्वरूप शिव को नमस्कार है।

श्लोक- शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय। श्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय तस्मै शि काराय नमः शिवायः॥

अर्थ- जो कल्याण स्वरूप हैं, पार्वती जी के मुख कमल को प्रसन्न करने के लिये जो सूर्य स्वरूप हैं, जो राजा दक्ष के यज्ञ का नाश करने वाले हैं, जिनकी ध्वजा में बैल का चिन्ह है, उन शोभाशाली श्री नीलकण्ठ 'शि' कार स्वरूप शिव को नमस्कार है।

श्लोक- वसिष्ठ कुम्भोद्भव गौतमार्य मुनींद्र देवार्चित शेखराय। चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय तस्मै व काराय नमः शिवायः॥

अर्थ- वशिष्ठ, अगस्त्य और गौतम आदि श्रेष्ठ ऋषि मुनियों ने तथा इंद्र आदि देवताओं ने, जिनके मस्तक की पूजा की है। चंद्रमा, सूर्य और अग्नि जिनके नेत्र हैं, उन 'व' कार स्वरूप शिव को नमस्कार है।

श्लोक- यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय। दिव्याय देवाय दिगंबराय तस्मै य काराय नमः शिवायः॥

अर्थ- यक्षरूप धारण करने वाले, जटाधारी, जिनके हाथ में उनका पिनाक नाम का धनुष है, जो दिव्य सनातन पुरुष हैं, उन दिगम्बर देव 'य' कार स्वरूप शिव को नमस्कार है।

पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेत् शिव सन्निधौ। शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥

जो शिव के पास इस पवित्र पंचाक्षर मंत्र का पाठ करता है, वह शिवलोक को प्राप्त होता है और वहां शिवजी के साथ आनंदित होता है।

||इति श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रं सम्पूर्णम्||

Friday, July 31, 2020

सदाशिव

सदाशिव सर्व वरदाता,
दिगम्बर हो तो ऐसा हो ।
हरे सब दुःख भक्तों के,
दयाकर हो तो ऐसा हो ॥

शिखर कैलाश के ऊपर,
कल्पतरुओं की छाया में ।
रमे नित संग गिरिजा के,
रमणधर हो तो ऐसा हो ॥

सदाशिव सर्व वरदाता,
दिगम्बर हो तो ऐसा हो ।

शीश पर गंग की धारा,
सुहाए भाल पर लोचन ।
कला मस्तक पे चन्दा की,
मनोहर हो तो ऐसा हो ॥

सदाशिव सर्व वरदाता,
दिगम्बर हो तो ऐसा हो ।

भयंकर जहर जब निकला,
क्षीरसागर के मंथन से ।
रखा सब कण्ठ में पीकर,
कि विषधर हो तो ऐसा हो ॥

सदाशिव सर्व वरदाता,
दिगम्बर हो तो ऐसा हो ।

सिरों को काटकर अपने,
किया जब होम रावण ने ।
दिया सब राज दुनियाँ का,
दिलावर हो तो ऐसा हो ॥

सदाशिव सर्व वरदाता,
दिगम्बर हो तो ऐसा हो ।

बनाए बीच सागर के,
तीन पुर दैत्य सेना ने ।
उड़ाए एक ही शर से,
त्रिपुरहर हो तो ऐसा हो ॥

सदाशिव सर्व वरदाता,
दिगम्बर हो तो ऐसा हो ।

देवगण दैत्य नर सारे,
जपें नित नाम शंकर जो,
वो ब्रह्मानन्द दुनियाँ में,
उजागर हो तो ऐसा हो ॥

सदाशिव सर्व वरदाता,
दिगम्बर हो तो ऐसा हो ।
हरे सब दुःख भक्तों के,
दयाकर हो तो ऐसा हो ॥

सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी। बिनती सुनहु सदासिव मोरी॥
आसुतोष तुम्ह अवढर दानी। आरति हरहु दीन जनु जानी

सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा॥
कुंडल कंकन पहिरे ब्याला। तन बिभूति पट केहरि छाला॥1॥

ससि ललाट सुंदर सिर गंगा। नयन तीनि उपबीत भुजंगा॥
गरल कंठ उर नर सिर माला। असिव बेष सिवधाम कृपाला॥2॥

* कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा। चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा॥
देखि सिवहि सुरत्रिय मुसुकाहीं। बर लायक दुलहिनि जग नाहीं॥3॥

* मनहीं मन महेसु मुसुकाहीं। हरि के बिंग्य बचन नहिं जाहीं॥
अति प्रिय बचन सुनत प्रिय केरे। भृंगिहि प्रेरि सकल गन टेरे॥2॥

* सिव अनुसासन सुनि सब आए। प्रभु पद जलज सीस तिन्ह नाए॥
नाना बाहन नाना बेषा। बिहसे सिव समाज निज देखा॥3॥

* कोउ मुख हीन बिपुल मुख काहू। बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू॥
बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना। रिष्टपुष्ट कोउ अति तनखीना॥4॥

* कंचन थार सोह बर पानी। परिछन चली हरहि हरषानी॥
बिकट बेष रुद्रहि जब देखा। अबलन्ह उर भय भयउ बिसेषा॥2॥

* तब नारद सबही समुझावा। पूरुब कथा प्रसंगु सुनावा॥
मयना सत्य सुनहु मम बानी। जगदंबा तव सुता भवानी॥1॥

* लगे होन पुर मंगल गाना। सजे सबहिं हाटक घट नाना॥
भाँति अनेक भई जेवनारा। सूपसास्त्र जस कछु ब्यवहारा॥2॥

दोहा :

* मुनि अनुसासन गनपतिहि पूजेउ संभु भवानि।
कोउ सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जियँ जानि॥100॥

* बाजहिं बाजन बिबिध बिधाना। सुमनबृष्टि नभ भै बिधि नाना॥
हर गिरिजा कर भयउ बिबाहू। सकल भुवन भरि रहा उछाहू॥3॥

* जबहिं संभु कैलासहिं आए। सुर सब निज निज लोक सिधाए॥
जगत मातु पितु संभु भवानी। तेहिं सिंगारु न कहउँ बखानी॥2॥

 सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं। रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं॥
बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू। राम भगत कर लच्छन एहू॥3॥

* सिव सम को रघुपति ब्रतधारी। बिनु अघ तजी सती असि नारी॥
पनु करि रघुपति भगति देखाई। को सिव सम रामहि प्रिय भाई॥4॥

नमामीशमीशान निर्वाण रूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदः स्वरूपम्‌ ।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं, चिदाकाश माकाशवासं भजेऽहम्‌ ॥

निराकार मोंकार मूलं तुरीयं, गिराज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम्‌ ।
करालं महाकाल कालं कृपालुं, गुणागार संसार पारं नतोऽहम्‌ ॥

तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं, मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम्‌ ।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारू गंगा, लसद्भाल बालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥

चलत्कुण्डलं शुभ्र नेत्रं विशालं, प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्‌ ।
मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं, प्रिय शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥

प्रचण्डं प्रकष्टं प्रगल्भं परेशं, अखण्डं अजं भानु कोटि प्रकाशम्‌ ।
त्रयशूल निर्मूलनं शूल पाणिं, भजेऽहं भवानीपतिं भाव गम्यम्‌ ॥

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी, सदा सच्चिनान्द दाता पुरारी।
चिदानन्द सन्दोह मोहापहारी, प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥

न यावद् उमानाथ पादारविन्दं, भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्‌ ।
न तावद् सुखं शांति सन्ताप नाशं, प्रसीद प्रभो सर्वं भूताधि वासं ॥

न जानामि योगं जपं नैव पूजा, न तोऽहम्‌ सदा सर्वदा शम्भू तुभ्यम्‌ ।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं, प्रभोपाहि आपन्नामामीश शम्भो ॥


शैलशुंग सम विशाल,जटाजूट चंद्रभाल,
गंगकी तरंग बाल,विमल झाल राचे,
लोचन त्रय लाल लाल,चंदनकी खोर भाल,
कुमकुम सिंदुर गुलाल,भ्रकुटी युगल साचे,
मूंडन की कंठ माल,विकसीत लरुके प्रशाल,
फटीक जाल रुद्रमाल,नर क्रूपाल राचे,
बम् बम् बम् डमरु बज,नादवेद स्वर सुसाज,
शंकर महाराज आज तांडव नाचे,
जीये शंकर महाराज आज तांडव नाचे..

भलकत्त हे चंद्र भाल जलकत्त हे नैन ज्वाल,
ढळक्तत हे गल विशाल मुंडन माला ,
धर्म भक्त प्रणतपाल, नाम रटत सो निहाल,-
काटत हे फ़ंद काल दीन दयाला,
शोभे योगी स्वरूप्, सहत ब्रखा, सीत, धुप,
धूर्जटि अनूप भस्म लेपन धारी सुन्दर...........2

घूमत शक्ति घुमंड, भुतनके झुंड़ झुंड ,
भभकत गाजत ब्रह्मांड नाचत भैरु,
करधर त्रिशूल कमंड, राक्षस दल देत दंड,
खेलत शंभु अखंड डहकत डेरुं,
देवन के प्रभुदेव, प्रगट सत्य अप्रमेव,
चतुरानन करत सेव नंदी, स्वारी.............3

करपूर गौरम करूणावतारम
संसार सारम भुजगेन्द्र हारम |
सदा वसंतम हृदयारविंदे
भवम भवानी सहितं नमामि ||

Monday, July 27, 2020

विश्वनाथाष्टकम् | विश्वनाथाष्टकस्तोत्रम्


विश्वनाथाष्टकस्तोत्रम्

आदिशम्भु-स्वरूप-मुनिवर-चन्द्रशीश-जटाधरं
मुण्डमाल-विशाललोचन-वाहनं वृषभध्वजम् ।
नागचन्द्र-त्रिशूलडमरू भस्म-अङ्गविभूषणं
श्रीनीलकण्ठ-हिमाद्रिजलधर-विश्वनाथविश्वेश्वरम् ॥ १॥
गङ्गसङग-उमाङ्गवामे-कामदेव-सुसेवितं
नादबिन्दुज-योगसाधन-पञ्चवक्तत्रिलोचनम् ।
इन्दु-बिन्दुविराज-शशिधर-शङ्करं सुरवन्दितं
श्रीनीलकण्ठ-हिमाद्रिजलधर-विश्वनाथविश्वेश्वरम् ॥ २॥
ज्योतिलिङ्ग-स्फुलिङ्गफणिमणि-दिव्यदेवसुसेवितं
मालतीसुर -पुष्पमाला -कञ्ज-धूप-निवेदितम् ।
अनलकुम्भ-सुकुम्भझलकत-कलशकञ्चनशोभितं
श्रीनीलकण्ठहिमाद्रिजलधर-विश्वनाथविश्वेश्वरम् ॥ ३॥
मुकुटक्रीट-सुकनककुण्डलरञ्जितं मुनिमण्डितं
हारमुक्ता-कनकसूत्रित-सुन्दरं सुविशेषितम् ।
गन्धमादन-शैल-आसन-दिव्यज्योतिप्रकाशनं
श्रीनीलकण्ठ-हिमाद्रिजलधर-विश्वनाथ-विश्वेश्वरम् ॥ ४॥
मेघडम्वरछत्रधारण-चरणकमल-विलासितं
पुष्परथ-परमदनमूरति-गौरिसङ्गसदाशिवम् ।
क्षेत्रपाल-कपाल-भैरव-कुसुम-नवग्रहभूषितं
श्रीनीलकण्ठ-हिमाद्रिजलधर-विश्वनाथ-विश्वेश्वरम् ॥ ५॥
त्रिपुरदैत्य-विनाशकारक-शङ्करं फलदायकं
रावणाद्दशकमलमस्तक-पूजितं वरदायकम् ।
कोटिमन्मथमथन-विषधर-हारभूषण-भूषितं
श्रीनीलकण्ठ-हिमाद्रिजलधर-विश्वनाथविश्वेश्वरम् ॥ ६॥
मथितजलधिज-शेषविगलित-कालकूटविशोषणं
ज्योतिविगलितदीपनयन-त्रिनेत्रशम्भु-सुरेश्वरम् ।
महादेवसुदेव-सुरपतिसेव्य-देवविश्वम्भरं
श्रीनीलकण्ठ-हिमाद्रिजलधर-विश्वनाथविश्वेश्वरम् ॥ ७॥
रुद्ररूपभयङ्करं कृतभूरिपान-हलाहलं
गगनवेधित-विश्वमूल-त्रिशूलकरधर-शङ्करम् ।
कामकुञ्जर-मानमर्दन-महाकाल-विश्वेश्वरं
श्रीनीलकण्ठ-हिमाद्रिजलधर-विश्वेनाथविश्वेश्वरम् ॥ ८॥
ऋतुवसन्तविलास-चहुँदिशि दीप्यते फलदायकं
दिव्यकाशिकधामवासी-मनुजमङ्गलदायकम् ।
अम्बिकातट-वैद्यनाथं शैलशिखरमहेश्वरं
श्रीनीलकण्ठ-हिमाद्रिजलधर-विश्वनाथविश्वेश्वरम् ॥ ९॥
शिवस्तोत्र-प्रतिदिन-ध्यानधर-आनन्दमय-प्रतिपादितं
धन-धान्य-सम्पति-गृहविलासित-विश्वनाथ-प्रसादजम् ।
हर-धाम-चिरगण-सङ्गशोभित-भक्तवर-प्रियमण्डितं
आनन्दवन-आनन्दछवि-आनन्द-कन्द-विभूषितम् ॥ १०॥
इति श्रीशिवदत्तमिश्रशास्त्रिसंस्कृतं विश्वनाथाष्टकस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

Tuesday, May 26, 2020

भगवान शिव के १०८ नामों का स्तोत्र : शिवाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

शिवशतनाम स्तोत्रम् या शिवाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् का प्रसंग शिवपुराण के रुद्रसंहिता के सृष्टि खण्ड में और श्रीरामचरितमानस में आया है।


शिव पुराण की कथा
इस स्तोत्र का उपदेश भगवान नारायण ने पार्वतीजी को दिया था। भगवान श्रीविष्णु ने भगवान शिव के १०८ नाम माता पार्वतीजी को बतलाए थे। शंकरप्रिया पार्वती ने भगवान विष्णु की प्रेरणा से एक वर्ष तक प्रतिदिन तीनों कालों में इसका जप किया जिससे उन्हें भगवान शंकर पतिरूप में प्राप्त हुए और वे उनकी अर्धांगिनी बन गईं।

श्रीरामचरितमानस की कथा
श्रीरामचरितमानस में एक कथा है कि देवर्षि नारद को काम पर विजय प्राप्त करने से गर्व हो गया था और वह कहने लगे कि शंकरजी ने कामदेव को क्रोध से जला दिया, इसलिए वे क्रोधी हैं, किन्तु मैं काम और क्रोध दोनों से ऊपर उठा हुआ हूँ। परन्तु वास्तविकता यह थी कि जहां पर नारदजी ने तपस्या की थी, शंकरजी ने उस स्थल को कामप्रभाव से शून्य होने का वर दे दिया था। भगवान विष्णु ने नारदजी के कल्याण के लिए अपनी माया से श्रीमतीपुरी नाम की एक नगरी बनायी जहां पर राजकुमारी विश्वमोहिनी का स्वयंवर हो रहा था। विश्वमोहिनी के रूप से आकर्षित होकर नारदजी भी स्वयंवर में आए। पर भगवान विष्णु ने स्वयं विश्वमोहिनी से विवाह कर लिया। कामपीड़ित नारदजी को यह देखकर बड़ा क्रोध आया। क्रोध में उन्होंने भगवान विष्णु को अपशब्द कहे और स्त्री-वियोग में विक्षिप्त-सा होने का शाप दे दिया। तब भगवान ने अपनी माया दूर कर दी और विश्वमोहिनी के साथ लक्ष्मीजी भी लुप्त हो गईं। यह देखकर नारदजी की बुद्धि शुद्ध हो गयी और वे भगवान के चरणों में गिरकर प्रार्थना करने लगे कि मेरा शाप मिथ्या हो जाए, मैंने आपको दुर्वचन कहे।


                                             

तब भगवान विष्णु ने नारदजी से कहा कि शिवजी मेरे सर्वाधिक प्रिय हैं। आप शिवशतनाम का जप कीजिए, इससे आपके सब पाप मिट जाएंगे और ज्ञान-वैराग्य और भक्ति सदा के लिए आपके हृदय में बस जायेगी-

जपहु जाइ संकर सत नामा।
होइहि हृदयँ तुरन्त विश्रामा।।
कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें।
असि परतीति तजहु जनि भोंरे।।
जेहिं पर कृपा न करहिं पुरारी।
सो न पाव मुनि भगति हमारी।। (मानस १।१३७।५-७)

इस प्रकार नारदजी ने शिवशतनामस्तोत्र का जप किया, जिससे उन्हें परम शान्ति की प्राप्ति हुई।
इस स्तोत्र के पाठ से पहले भगवान शंकर का ध्यान इस प्रकार करना चाहिए-

'चन्द्रमण्डल में श्रीशिवजी विराजमान हैं, उनका गौर शरीर है, सर्प का कंगन और सर्प का ही हार पहने हुए हैं। शरीर पर भस्म लगाए हुए हैं, उनके हाथों में मृगी-मुद्रा एवं परशु हैं और अर्धचन्द्र सिर पर विराजमान है। मैं उन भगवान शंकर का हृदय में चिन्तन करता हूँ।'



शिवाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्


शिवो महेश्वर: शम्भु: पिनाकी शशिशेखर:।

वामदेवो विरुपाक्ष: कपर्दी नीललोहित:।।
शंकर: शूलपाणिश्च खट्वांगी विष्णुवल्लभ:।
शिपिविष्टोऽम्बिकानाथ: श्रीकण्ठो भक्तवत्सल:।।

भव: शर्वस्त्रिलोकेश: शितिकण्ठ: शिवाप्रिय:।

उग्र: कपालि: कामारिरन्धकासुरसूदन:।।
गंगाधरो ललाटाक्ष: कालकाल: कृपानिधि।
भीम: परशुहस्तश्च मृगपाणिर्जटाधर:।।

कैलासवासी कवची कठोरस्त्रिपुरान्तक:।

वृषांको वृषभारूढो भस्मोद्धूलितविग्रह:।।
सामप्रिय: स्वरमयस्त्रयीमूर्तिरनीश्वर:।
सर्वज्ञ: परमात्मा च सोमसूर्याग्निलोचन:।।

हविर्यज्ञमय: सोम: पंचवक्त्र: सदाशिव:।

विश्वेश्वरो वीरभद्रो गणनाथ: प्रजापति:।।
हिरण्यरेता दुर्धर्षो गिरीशो गिरिशोऽनघ:।
भुजंगभूषणो भर्गो गिरिधन्वा गिरिप्रिय:।।

कृत्तिवासा पुरारातिर्भगवान् प्रमथाधिप:।

मृत्युंजय: सूक्ष्मतनुर्जगद् व्यापी जगद्गुरु:।।
व्योमकेशो महासेनजनकश्चारुविक्रम:।
रुद्रो भूतपति: स्थाणुरहिर्बुध्न्यो दिगम्बर:।।

अष्टमूर्तिरनेकात्मा सात्त्विक: शुद्धविग्रह:।

शाश्वत: खण्डपरशुरजपाशविमोचक:।।
मृड: पशुपतिर्देवो महादेवोऽव्यय: प्रभु:।
पूषदन्तभिदव्यग्रो दक्षाध्वरहरो हर:।।

भगनेत्रभिदव्यक्त: सहस्त्राक्ष: सहस्त्रपात्।

अपवर्गप्रदोऽनन्तस्तारक: परमेश्वर:।।
एतदष्टोत्तरशतनाम्नामाम्नायेन सम्मितम्।
विष्णुना कथितं पूर्वं पार्वत्या इष्टसिद्धये।।

शंकरस्य प्रिया गौरी जपित्वा त्रैकालमन्वहम्।

नोदिता पद्मनाभेन वर्षमेकं प्रयत्नत:।।
अवाप सा शरीरार्धं प्रसादाच्छूंलधारिण:।
यस्त्रिसंध्यं पठेच्छम्भोर्नाम्नामष्टोत्तरं शतम्।।

शतरुद्रित्रिरावृत्त्या यत्फलं प्राप्यते नरै:।

तत्फलं प्राप्नुयादेतदेकवृत्त्या जपन्नर:।।
बिल्वपत्रै: प्रशस्तैर्वा पुष्पैश्च तुलसीदलै:।
तिलाक्षतैर्यजेद् यस्तु जीवन्मुक्तो न संशय।।

नाम्नामेषां पशुपतेरेकमेवापवर्गदम्।

अन्येषां चावशिष्टानां फलं वक्तुं न शक्यते।।


।।इति श्रीशिवरहस्ये गौरीनारायणसंवादे शिवाष्टोत्तरशतदिव्य नामामृतस्तोत्रं सम्पूर्णम्।।

पाठ का फल
शतरुद्री के तीन बार पाठ करने से जो फल मनुष्य को प्राप्त होता है, वह फल उसे इस स्तोत्र के एक बार पाठ करने से प्राप्त हो जाता है। बेलपत्र, फूल और तुलसीदल से या तिल और अक्षत से जो महादेवजी का पूजन करते हैं, वे जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाते हैं। भगवान शंकर के केवल एक नाम का जप ही मोक्ष देने वाला है फिर यदि शतनाम का पाठ किया जाए तो उसका फल वर्णनातीत है।